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साधनाओ के कुछ नियम जो आवश्यक होते है

 साधनाओ के कुछ नियम जो आवश्यक होते है  1. जब तक योग्य गुरु आपको साधना नही देते जब तक साधना नही करना चाहिए  2. साधना हमेशा साफ जगह में करना चाहिए  3. साधना के समय मे कोई नही जाना चाहिए एवं गुरु के अलावा किसी को नही बताना चाहिए  4 साधना के आसान बिछाने के पहले कुछ मोटा कम्बल आदि बिछना चाहिए उसके बाद आसान बिछना चाहिए  5 साधना में उपयोग समान को बहते हुए जल में दुसरे दिन विर्सजित कर देना चाहिए  6. साधनाओ में संकल्प ऐसा लेना चाहिए कि वो पूरा कर सके  7. साधना हो सके तो रात्री 10 बजे के बाद करना चाहिए  8. साधना में पूरा बिस्वास रखना चाहिए  9. साधना आरंभ करने के पहले पूर्वज कुल देवी देवता इस्ट देवी देवता आदि का ध्यान आवश्यक करना चाहिए  10. साधना काल मे नशे मास लहसुन प्याज आदि का प्रयोग नही करना चाहिए  11. साधना काल मे कम से कम बोलना चाहिए  12. साधना काल मे हो सके तो मानसिक जाप करना चाहिए  13. गुस्सा और झूठ नही बोलना चाहिए  14. साधना काल में जमीन में सोना चाहिए  15.  साधना काल मे यदि कुछ आवाजे सुनाई दे या कोई आभास...

पित्र दोष किसे कहते हे बचाव एवं निवारण

आज पित्र दोष के बारे मे जानकारी प्रदान की जाएगी  सबसे पहले ये जानना जरूरी होता हे की पित्र दोष किसे कहते पित्र दोष के बचाव क्या हे किन बजहों से पित्र दोष लगता हे केसे पता करे की हमारे उपर पित्र दोष हे पित्र दोष लगता हे केसे पता करे की हमारे उपर पित्र दोष हे  1-   पित्र दोष किसे कहते  हे - भूतकाल मे सहपिंडी की आंतयोटसी पिंड दान एवं बिसमरण करने की बजह से जो दोष लगता हे उसको पित्र दोष कहते हे  2-   पित्र दोष लगता हे केसे पता करे की हमारे उपर पित्र दोष हे पित्र दोष लगने के बहुत सी बजह हो सकती हे परंतु ऋषि के द्वारा जो जानकारी शास्त्रो मे दी गई हे वह मे आपको बता रहा हु  1- भूतकाल मे सहपिंडी की आंतयोटसी पिंड दान का तर्पण उपयुक्त बिधी से नहीं किए जाने से पित्र दोष लगता हे  2- किसी भी पर्व की तिथियो मे संबंध ( सेक्स) करने की बजह से  पित्र दोष लगता हे  3- अपने से नीचे कुल मे शादी करने से  पित्र दोष लगता हे  4- पवित्र जगह पवित्र नदी के आसपास गलत काम करने से पित्र दोष लगता हे  5- गाय मूक जानवर की हत्या करने क...

बृहस्पतिकवचम्

बृहस्पतिकवचम्     श्रीगणेशाय नमः । अस्य श्रीबृहस्पतिकवचस्तोत्रमन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः। , अनुष्टुप् छन्दः। , गुरुर्देवता। , गं बीजं। , श्रीशक्तिः। , क्लीं कीलकं। , गुरुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः । अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् । अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ १॥ बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः । कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मेऽभीष्टदायकः ॥ २॥ जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः । मुखं मे पातु सर्वज्ञो कण्ठं मे देवतागुरुः ॥ ३॥ भुजावाङ्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः । स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ ४॥ नाभिं देवगुरुः पातु मध्यं पातु सुखप्रदः । कटिं पातु जगद्वन्द्य ऊरू मे पातु वाक्पतिः ॥ ५॥ जानुजङ्घे सुराचार्यो पादौ विश्वात्मकस्तथा । अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे सर्वतो गुरुः ॥ ६॥ इत्येतत्कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥ ॥ इति श्रीब्रह्मयामलोक्तं बृहस्पतिकवचं सम्पूर्णम् ॥    

भविष्यपुराणान्तर्गतसूर्यसहस्रनामस्तोत्रम्

  भविष्यपुराणान्तर्गतसूर्यसहस्रनामस्तोत्रम्   । अथ भविष्यपुराणान्तर्गतसूर्यसहस्रनामस्तोत्रम् । ॐ विश्वजिद् विश्वजित्कर्ता विश्वात्मा विश्वतोमुखः । विश्वेश्वरो विश्वयोनिर्नियतात्मा जितेन्द्रियः ॥ १॥ कालाश्रयः कालकर्ता कालहा कालनाशनः । महायोगी महाबुद्धिर्महात्मा सुमहाबलः ॥ २॥ प्रभुर्विभुर्भूतनाथो भूतात्मा भुवनेश्वरः । भूतभव्यो भावितात्मा भूतान्तःकरणः शिवः ॥ ३॥ शरण्यः कमलानन्दो नन्दनो नन्दवर्धनः । वरेण्यो वरदो योगी सुसंयुक्तः प्रकाशकः ॥ ४॥ वाक्प्राणः परमः प्राणः प्रीतात्मा प्रियतः प्रियः । नयः सहस्रपात् साधुर्दिव्यकुण्डलमण्डितः ॥ ५॥ अव्यङ्गधारी धीरात्मा प्रचेता वायुवाहनः । समाहितमतिर्धाता विधाता कृतमङ्गलः ॥ ६॥ कपर्दी कल्पकृद्रुद्रः सुमना धर्मवत्सलः । समायुक्तो विमुक्तात्मा कृतात्मा कृतिनांवरः ॥ ७॥ अविचिन्त्यवपुः श्रेष्ठो महायोगी महेश्वरः । कान्तः कामादिरादित्यो नियतात्मा निराकुलः ॥ ८॥ कामः कारुणिकः कर्ता कमलाकरबोधनः । सप्तसप्तिरचिन्त्यात्मा महाकारुणिकोत्तमः ॥ ९॥ संजीवनो जीवनाथो जगज्जीवो जगत्पतिः । अजयो विश्वनिलयः संविभागो वृषध्वजः ॥ १०॥...